भारतीय कृषि का विकास एवं शासकीय नीतियां

 

डाॅ अर्चना सेठी

सहायक प्राध्यापकए अर्थशास्त्र अघ्ययनशाला, प्ंा रविशंकरशुक्ल विश्वविद्यालयए रायपुर

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू   

 

 

उदारीकरण और औद्योगीकरण के बाद कृषि की उपेक्षा का दुष्परिणाम महंगे खाद्यान्न के रुप में सामने आया कृषि की उपेक्षा एवं द्धितीयक तृतीयक क्षेत्रों का विकास के कारण कृषि का सकल घरेलू राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान जहां 1950 में 55 प्रतिशत था वह 2014. 15 में 13 प्रतिशत हो गया।;तालिका 2 एवं रेखाचित्र 2द्ध।कृषि में निवेश समय की मांग थी जिसे अनदेखा किया गया इसका असर केवल खाद्यान्न उत्पादन पर पडा वरन शहरों की ओर पलायन भी बढ गया जिससे शहरों में मकान पानी टांसपोर्ट की समस्या उत्पन्न हुई।आज भी देश की आबादी का बडा हिस्सा कृषि पर आश्रित है और उसे केवल सहारा बल्कि गति देना भी जरुरी है।जी डी पी में विकास की दर सेवाक्षेत्र पर आधरित है इससे धन तो आता है लेकिन अधिक रोजगार देने में यह असमर्थ है बडे उद्योग चंद उद्योगपतियों के हांथ में है इनसे भी रोजगार सृजन ज्यादा नहीं होता आवश्यकता है कि कृषि का विकास किया जाय कृषि आधरित उद्योगों का विकास किया जाय साथ ही कुटीर लघु एवं मघ्यम उद्योगों का विकास किया जाय।कृषि में चुनौतियां अभी बहुत है तथा शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन पर सब कुछ निर्भर करेगा।योजनाओं का क्रियान्वयन भी अपने आप में बहुत बडी चुनौती है।

 

विकास दरए समावेशी एजीडीपी 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

भारतीय अर्थब्यवस्था कृषि के इर्द गिर्द ही चक्कर लगाता है हमारी अर्थबयवस्था का निर्धारण कृषि से ही होता है ।औद्योगीकरण एवं अन्य वाणिज्यिक गतिविधियों के बढने से सकल घरेलू अनुपात में कृषि का योगदान कम हुआ है लेकिन भारत की जनसंख्या का बडा हिस्सा आज भी रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर है।आज भी हमारे देश में कृषि कुल श्रमशक्ति के 48 ण्9 प्रतिशत को रोजगार उपलब्ध कराती है। विश्व विकास रिपोर्ट 2008 के अनुसार निर्धनता दूर करने में कृषि जीडीपी में वृद्धि गैर कृषि में वृद्धि से दोगुना प्रभावी होता है जो समावेशी विकास के लिए आवश्यक हे।यदि कृषि में 4 प्रतिशत विकास दर प्राप्त हो जाय तो ग्रामीण निर्धनता को बहुत कम किया जा सकता है।

 

अध्ययन का उददेश्य

1 कृषि विकास का अध्ययन करना।

2 कृषि विकास में शासकीय नीतियों की भूमिका का अध्ययन करना।

 

भारतीय कृषि का विकास 

भारतीय कृषि की उपलब्धियां निस्संदेह प्रभावपूर्ण रही है। अनाज के उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है 1950 में हम अनाज के आयातक थे जो 1913 में अनाज के निर्यातक बन गए। सिंचाईसुविधा 11 प्रतिशत से बढकर 45 प्रतिशत हो गया उर्वरक का खपत जो पहले नगण्य थी वह 141 किग्राम प्रतिहेक्टेअर हो गया। छठवें दशक से पहले उत्पादन बढने का श्रेय क्षेत्रफल में वृद्धि था लेकिन हरित क्रांति के बाद से उतपादकता में वृद्धि हुई है।पहली पंचवर्षीय योजना से चैथी योजना ;1951. 1974 द्धतक कृषि और संबंधित क्षेत्र की औसत विकास दर 2 ण्2 प्रतिशत था ।प्रथम योजना में यह 2ण् 7 प्रतिशत थी जो दसरी योजना में 3ण् 1 प्रतिशत हो गई तथा तीसरी योजना में. 0.7 हो गईं एवं चतुर्थ योजना में 2ण् 6 प्रतिशत हो गई।।1974 से 1990 अर्थात पांचवी योजना से सातवीं योजना तक औसत कृषि विकास दर 3ण् 47 था। पांचवी योजना मं विकास दर 3ण्2 प्रतिशत थी जो छठवीं योजना में 2ण् 5 एव सातवीं योजना में 3ण्5 प्रतिशत हो गया।आर्थिक सुधारों 1991 से 2014 तक कृषि और संबंधित क्षेत्र की औसत विकास दर 3ण् 2प्रतिशत है जो वर्तमान योजना के लिए लक्षित विकासदर 4 प्रतिशत से कम है।योजनावधि में बहुत उतार चढाव आए।आठवीं योजना 1992 से 1997 तक विकास दर 4ण् 8 प्रतिशत थी नवमीं योजना ;1997. 2002द्ध के प्रारंभ में इसमें कमी आना शुरु हो गया जो दसवीं योजना ;2002.07द्ध के दौरान 2ण्4 हो गया ।ग्यारहवीं योजना के दौरान यह 4ण्1 प्रतिशत हो गया लेकिन बारहवीं योजना के दौरान यह पुनः कम होकर 3 प्रतिशत हो गई। ;तालिका 1 एवं रेखाचित्र 1द्ध

 

             

विकास के विभिन्न चरणों में शासकीय नीति की भूमिका

कृषि विकास पर नजर डालने वाले घटकों को पांच भाग में बांटा जा सकता है। प्राकृतिक प्रौद्योगिकी आर्थिक संस्थागत और नीति घटक।प्राकृतिक में मृदा जलवायु वर्षा तथा तापमान शामिल है।प्रौद्योगिकी विषयक घटकों में बीज मशीनरी कीट संरक्षक एवं उर्वरक शामिल है।आर्थिक घटकों में कृषि में प्राप्त लाभ तथा विभिन्न फसलों से प्राप्त सापेक्षिक मुनाफा अंतर फसल आबंटन को प्रभावित करता है।चतुर्थ घटक संस्थगत में औपचारिक एव अनौपचारिक दोनों तरह के संस्था आते हैं। औपचारिक में भारतीय खाद्य निगम जैसे संस्था तथा अनौपचारिक में साहूकार जैसी संस्था आता है।अंतिम घटक में शासकीय नीतियां आती है जो प्राकृतिक घटक को छोडकर अन्य सभी घटकों को प्रभावित करती है।

 

भारत में कृषिनीति के विकास को मोटे तौर पर छह चरणों में विभक्त किया जा सकता है।प्रथम चरण में 1951 1965 में कृषि में कम ध्यान दिया गया।प्रथम तीन पंचवर्षीय योजनाओं में उद्योग आयोजना का प्रमुख क्षेत्र रहा।इस चरण में खाद्यान्न की आवश्यकता अमेंरीका के पीएल 480 आयात के जरिए पूरी की गई।इस अवधि में कृषि उत्पादकता में कोई वृद्धि नही हुई केवल कृषि क्षेत्र में वृद्धि हुई।इस चरण में कृषि का संपादन प्राकृतिक घटकों द्धारा होता था।

 

द्धितीय चरण 1966 1980 में खाद्य की कमी एवं पी एल 480 से खाद्यान्न आयात में ब्यवधान के कारण खाद्यान्न निर्भरता प्रमुख लक्ष्य था जिसके कारण सिंचाई उर्वरक बिजली में निवेशों में अनुदान को प्राथमिकता दी गई।न्यूनतम समर्थन मूल्य शुरु की गई तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के द्धारा अनाज की आपूर्ति शुरु की गई।कई महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना कृषि मूल्य आयोग जिसे अब सी सी पी के नाम से जाना जाता है।भारतीय खाद्य निगम एवं डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना इसी अवधि में की गई।हरितक्रांति के द्धारा कृिष का विकास हुआ उत्पादकता में वृद्धि हुई।खाद्यान्न निर्भरता प्राप्त हुआ भूखमरी समाप्त हुआ।इस चरण में आर्थिक प्रौद्यागिकी विषयक तथा संस्थागत तत्वों का पूर्ण समायोजन प्राप्त हुआ।

 

तृतीय चरण1981 1991 कृषि विकास की सर्वोत्कृष्ट अवस्था थी हरित क्रांति का उत्तर पश्चिम के अलावा अन्य क्षेत्रों पर भी प्रसार हुआ।अंतरक्षेत्रीय समानता के लक्ष्य के साथ विकास किया गया।अनाज के अतिरिक्त दलहन एवं तिलहन पर ध्यान केंद्रित किया गया जो अभी तक पिछडा हुआ है।इस चरण में कोई नई प्राद्योगिकी नहीं अपनायी गई।1960 केदशक में अपनायी गई हरित क्राति को बनाए रखने के लिए शासकीय सहायता के लिए केंद्र सरकार पर लगातार दबाव डाला गया जिसके कारण निवेश में कमी एवं खाद्य उर्वरक बिजली सिंचाई के लिए अनुदान में वृद्धि हुई।1990 के दशक में शासकीय निवेश में यह कमी 1997 के आते तक संकट का रुप ले लिया। गई।तीसरे चरण में एच वी वाइ प्रौद्योगिकी का प्रसार देश के अन्य भागों में किया गया लेकिन कोई विशेष उपलब्धि हासिल नहीं हो पाया।

 

 

 

चतुर्थ चरण 1992 2004 आर्थिक सुधारों के साथ शुरु हुआ।इस चरण को दो उपचरणों में बांटा जा सकता है।1992 से1997 तथा 1997 से 2004 तक।प्रथम उपचरण में कृषि विरोधी पक्षपात में कमी आयी आर्थिक सुधारों के फलस्वरुप विनिमयदर ब्यवस्था में सुधार हुआएवं 1991 92 में सभी वस्तुओं पर आयात नियंत्रण हटा दिया गया जिससे कृषि के लिए ब्यापार शर्तों में सुधार हुआ जिससे कृषि क्षेत्र में निजी क्षेत्र में पंूजी निर्माण 2000..01 में बढकर 14931 करोड हो गया जो 1990.91 में 11424 करोड था। द्धितीय उपचरण में राजकाषीय घाटे के कारण कृषि में सार्वजनिक निवेश में कमी आयी 1981.82 में सार्वजनिक निवेश 7130 करोड थी जो 1990.91 में घटकर 4992 करोड हो गया 2000 .01 में और भी घटकर 4520 करोड हो गया।कृषि क्षेत्र में निवेश में कमी के कारण कृषि में वृद्धिदर 1990 के दशक में 3 ण्1 प्रतिशत रह गई जो कि 1980 के दशक में 3ण् 5 प्रतिशत थी।1997..2004 के दौरान कृषि की औसत वार्षिक वृद्धि दर 2ण् 2 प्रतिशत हो गई जो हरितक्रांति के पूर्व के समय में थी।इस समय गैरकृषि क्षेत्र की वृद्धिदर 7 प्रतिशत थी जिससे बहुत अंतरक्ष्ेात्रीय असमानता पैदा हुई।कृषि में शासकीय निवेश में कमी  के कारण 1997 से 2004 तक कृषि दर 1990 के दशक में 2ण् 3 प्रतिषत हो गई जो 1980 के दशक में 3ण् 2 प्रतिशत थी।1995 से 2004 के दौरान किसानों की आत्महत्या में 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई जिसे कृषि संकट का नाम दिया गय

 

पंचम चरण 2005.2013 में कृषि में शासन की भूमिका बढी और अनेक कार्यक्रम शुरु हुआ। कृषि में सार्वजनिक निवेश को रोकने कृषकों की आय बढाने उत्पादन बढाने के लिए प्रयास किया गया।2007 में राज्यीय कृषि विकास आर के वी वाइ योजना शुरु की गई जिसका लक्ष्य राज्यों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना था। इस कार्यक्रम की प्रारंभिक परिणामों से कृषि में कुल पूंजी निर्माण में सुधार हुआ एवं कृषि विकास दर स्थिर एव उच्च रही। 2007 में राष्टीª खाद्य सुरक्षा मिशन एन एफ एस एम शुरु की गई।जिसका उददेश्य चांवल गेहूं दाल के उत्पादन को 11 वीं योजना के अंत तक 1 करोड 80 लाख 20 लाख टन बढाना था।जिसमें सफलता प्राप्त हुई।तीसरा कार्यक्रम राष्टीª खाद्य सुरक्षा अधिनियम था जिसका लक्ष्य भोजन तक सभी की आथ््िर्राक पहुंच कायम करना है।इसमें प्रत्येक लाभार्थी परिवार को वाइ अंत्योदय योजना के अंतर्गत वरीयता अनुसार 35 कि ग्रा अनाज या 25 किलो अनाज चांवल गंेहू बाजरा क्रमशः 3 2 1 रु प्रति किलो की दर से दिया जाएगा।

 

छठवंे चरण में वर्ष 2014.15 में मानसून में 12 प्रतिशत की कमी से फसल उत्पादन 3 ण्2 प्रतिशत कम हुआ।2015 .16 में मानसून में पुनः 14 प्रतिशत की कमी हुई।1901 से लेकर अब तक चैथी बार ऐसा हुआ कि लगातार दो बार दश्ेा को सूखे का सामना करना पडा।कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि ने फसलों को प्रभावित किया।किसान तथा ग्रामीण अर्थब्यवस्था पर प्रभाव पडना तय है।

इन सभी संर्दभों को देखें तो यह ज्ञात होना आवश्यक हो जाता है कि कृषि एवं किसानों से जुडी वर्तमान शासन की योजनाएं किस प्रकार है।वर्तमान सरकार द्धारा पुनर्गठित नीति आयोग का दस्तावेज कृषि एवं किसानों से संबंधित शासन की योजना को स्पष्ट करता है।

1 उत्पादन बढाने के लिए तमाम जरुरी प्रयास।

2 किसानों के उत्पाद का उचित मूल्य।

3 पटटे पर भूमि देने की नीतियों में सुधार।

4 प्राकृतिक आपदाओं से त्वरित राहत के लिए तंत्र निर्माण

5 पूर्वोत्तर राज्यों में हरितक्रांति का प्रसार।

 

इन सबका दूरगामी परिणाम लम्बे समय के बाद पता चलेगा।

उदारीकरण और औद्योगीकरण के बाद कृषि की उपेक्षा का दुष्परिणाम महंगे खाद्यान्न के रुप में सामने आया कृषि की उपेक्षा एवं द्धितीयक तृतीयक क्षेत्रों का विकास के कारण कृषि का सकल घरेलू राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान जहां 1950 में 55 प्रतिशत था वह 2014. 15 में 13 प्रतिशत हो गया।कृषि में निवेश समय की मांग थी जिसे अनदेखा किया गया इसका असर केवल खाद्यान्न उत्पादन पर पडा वरन शहरों की ओर पलायन भी बढ गया जिससे शहरों में मकान पानी टांसपोर्ट की समस्या उत्पन्न हुई।आज भी देश की आबादी का बडा हिस्सा कृषि पर आश्रित है और उसे केवल सहारा बल्कि गति देना भी जरुरी है।जी डी पी में विकास की दर सेवाक्षेत्र पर आधरित है इससे धन तो आता है लेकिन अधिक रोजगार देने में यह असमर्थ है बडे उद्योग चंद उद्योगपतियों के हांथ में है जिनके संकुचित दृष्टिकोण के कारण इनसे भी रोजगार सृजन ज्यादा नहीं होता आवश्यकता है कि कृषि का विकास किया जाय कृषि आधरित उद्योगों का विकास किया जाय साथ ही कुटीर लघु एवं मघ्यम उद्योगों का विकास किया जाय।कृषि में चुनौतियां अभी बहुत है तथा शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन पर सब कुछ निर्भर करेगा।योजनाओं का क्रियान्वयन भी अपने आप में बहुत बडी चुनौती है।

 

 

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1 Sharma,VijayPal (2012)Accelerating Agricultural development for Inclusive March,P.n.1-17.

2.Kaur,Harneet(2013)Agriculture: The way to Inclusive Growth,IOSR-JBM(Journal of Bussiness and Management,Vol.-9,Issue-6,March-April,PP.-42-47.

3 xqykVh, v'kksd ,oa tSu ,lqjHkh (2014) Hkkjr ds d`f’k lao/kZu esa fuos'k dh Hkwfedk,;kstuk, vad, la[;k 6,twu, i`6- 9

4 'ks[kj lh ,e lh (2014) Hkkjrh; d`f’k - uhfr ,oa fu’iknu dh leh{kk`, ;kstuk, vad , la[;k 6 ,twu ,i` 77-80

 

 

 

 

 

 

Received on 2.12.2018                  Modified on 14.01.2019

Accepted on 08.03.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):227-230.